Friday, December 02, 2005

नवें दशक का उफान

आजकल जबकि भारत की मुख्‍यधारा के सामाचार-माध्‍यमों में मूर्तिपूजा (नये देवता का नाम नारायण मूर्ति है) का दौर चल रहा है और हमारे प्रधानमंत्री साफ तौर पर कह रहे हैं कि वैश्‍वीकरण की संभावनाओं को संदेह की दृष्‍टि से देखने वाले लोग अतीत में जी रहें हैं, पश्‍चिम के कई राजनीतिक और आर्थिक विश्‍लेषक उभरती हुई विश्‍व-व्‍यवस्‍था (राजनीतिक और आर्थिक)की कुछ अलग ही तस्‍वीर पेश कर रहे हैं।मजे की बात है कि इन तमाम राजनीतिक विश्‍लेषकों और अर्थशास्‍त्रियों को अतीत में जीने वाले अति उत्‍साही वामपंथी चिंतक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

पिछले दिनों दो किताबें मेरे हाथ लगीं।पहली किताब जोसेफ स्‍टिग्‍लित्‍ज की है- The Roaring Nineties: A New History of the World's Most Prosperous Decade .
नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित अर्थशास्‍त्री स्‍टिग्‍लित्‍ज अभी हाल तक राष्‍ट्रपति क्‍लिंटन के आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरपर्सन थे।नवें दशक की आर्थिक नीतियों के निर्धारण में उनकी भागीदारी रही है।इसलिए नवें दशक के उफान के थमने के बाद उस दशक की समीक्षा उनके लिए आत्‍मनिरीक्षण जैसा है।स्‍टिग्‍लित्‍ज की यह किताब २००३ में प्रकाशित हुई।आज जबकि अमेरिकी अर्थव्‍यवस्‍था की डवाँडोल स्‍थिति महज अफवाह नहीं है और मुख्‍यधारा के पश्‍चिमी समाचार-पत्रों में भी यह मसला जोर पकड़ता जा रहा है (देखें संपादकीय,The New York Times,MONDAY, NOVEMBER 28, 2005),स्‍टिग्‍लित्‍ज की यह किताब खास तौर पर प्रासंगिक है।

आमतौर पर भ्रष्‍टाचार को सरकारी तंत्र से जोड़कर देखा जाता है और निजीकरण के पक्ष में कार्यकुशलता के साथ एक तर्क पारदर्शिता और accountibility का भी दिया जाता है।इस संदर्भ में इस पुस्‍तक के दो अध्‍याय खास तौर पर उल्‍लेखनीय हैं-The creative accounting और Enron. अगर भारतीय नौकरशाह सामान्‍य हित को ताक पर रखकर अपना उल्‍लू सीधा कर सकते हैं तो अमेरिकन सी इ ओ और उनके भारतीय सहयोगियों को भी कम करके नहीं आँकना चाहिए।

जो दूसरी किताब मेरे हाथ लगी वह Immanual Todd की है- After the Empire: The Breakdown of American Order .

जनसांख्‍यिकी और सामाजिक/सांस्‍कृतिक नृतत्‍वशास्‍त्र के इस विशेषज्ञ ने १९७५ में सोवियत यूनियन के बिखरने की भविष्‍यवाणी की थी।भविषयवाणियों में मेरा भरोसा नहीं है, लेकिन वर्तमान अंतर्राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य का इस लेखक ने जैसा विश्‍लेषण किया है वह दूरदर्शितापूर्ण अवश्‍य है।
बहरहाल इस पुस्‍तक की विस्‍तार से चर्चा बाद में, फिलहाल आप सब को अच्‍छे सप्‍ताहांत की शुभकामनायें!

2 Comments:

Blogger मिर्ची सेठ said...

दो अच्छी पुस्तको के बारे में बताने के लिए शुक्रिया। कुछ ऐसी ही बात जरमी सीगल ने फ्यूचर फॉर इनवेस्टरस़ में कही है। आपकी प्रविष्टि पढ़ कर लिखने का मोजो बना है आज ही लिखता हूँ।

6:28 PM  
Blogger dwainalexander5983720925 said...

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